प्राचीन समय में शिक्षा का अर्थ

प्राचीन काल में शिक्षा से तात्पर्य आत्म - ज्ञान तथा आत्म प्रकाश माना जाता था। समय के परिवर्तन के साथ - साथ शिक्षा का अर्थ व महत्व भी परिवर्तित होता रहा। प्राचीन काल में यूनान में राजनीतिक ; शारीरिक ;मानसिक ; नैतिक तथा सौंदर्य शिक्षा प्रदान की जाती थी। उस समय शिक्षा का उद्देश्य केवल बलिष्ठ सैनिक उत्पन्न करना था।
                                              आधुनिक शिक्षा आजीवन चलने वाली बहू - आयामी प्रक्रिया है जो व्यक्ति के जीवन के साथ निरंतर चलती रहती है। व्यक्ति को विद्यालयी शिक्षा के अतिरिक्त जीवनोपयोगी हर प्रकार की शिक्षा लेनी पड़ती है। व्यक्ति कठिनाइयों अर्थात् दुःख से भी शिक्षा मिलती है और सुख से तो लेता ही है। छोटे बड़े सबसे कुछ न कुछ सीखने को मिलता जाता है।
             शिक्षा शब्द की  व्युत्पत्ति संस्कृत की `शिक्षा ' धातु से हुई है जिसका अर्थ है सीखना और सिखाना। इस अर्थ में यदि हम देखें तो शिक्षा में वह सब कुछ निहित है जो हम समाज में रहकर सीखते हैं। शिक्षा शास्त्री शिक्षा का प्रयोग प्रायः तीन रूपों में करते हैं -
        (1) ज्ञान (knowledge)
        (2) पाठ्यचर्या का एक विषय ( subject of curriculum)
        (3) व्यवहार में परिवर्तन लाने वाली प्रक्रिया ( process of changing in the behaviour)

           वास्तव में देखा जाए तो शिक्षा का तीसरा अर्थ अधिक उचित प्रतीत होता है। समाज में रहकर व्यक्ति जो कुछ सीखता है, उसी के परिणामस्वरूप वह स्वयं को पाशविक प्रवृतियों से ऊंचा उठाता है और सभ्य एवं सामाजिक प्राणी बनने की इच्छा रखता है। शिक्षा के द्वारा ही बालक का मार्गदशन होता है परन्तु इन सन्दर्भो में शिक्षा को समझने हेतु हमारे लिए यह अनिवार्य होता है कि हम शिक्षा को विद्यालय की चहारदीवारी के अंदर चलने वाली प्रक्रिया ही न माने वरण इसे समाज अनवरत चलने वाली प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करें। निसंदेह हम यह कह सकते हैं कि मानव जीवन को सजाने व संवारने में शिक्षा की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण रही है। साथ ही शिक्षा के द्वारा ही समाज अपनी संस्कृति व सभ्यता की रक्षा करते हुए उसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित करता है। इसके साथ ही समाज में रहकर वयक्ती जो कुछ सीखता है, उसी के परिणाम स्वरूप वह स्वयं को पाशविक प्रवृतियों से ऊंचा उठाता है और एक सभ्य एवं सामाजिक प्राणी बनने की इच्छा रखता है। वास्तव में शिक्षा ही वह प्रक्रिया है जो बालक को उचित प्रशिक्षण देते हुए उसका मार्गदर्शन करती है।

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